डेवलपमेंटल डिले (विकास में देरी) के कारण — एक स्पीच थेरेपिस्ट की सच्ची बात
डेवलपमेंटल डिले (विकास में देरी) के कारण — एक स्पीच थेरेपिस्ट की सच्ची बात

जब कोई माता-पिता मेरे पास आते हैं और धीरे से कहते हैं, “ हमारा बच्चा अभी तक ठीक से बोल नहीं रहा… क्या ये नॉर्मल है?”, तो मैं उनके चेहरे पर चिंता साफ देख पाता/पाती हूँ। सच कहूँ, तो यह सवाल आजकल बहुत आम हो गया है।
हर बच्चा अपने तरीके से बढ़ता है, ये बात सही है। लेकिन कुछ ऐसे संकेत होते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डेवलपमेंटल डिले कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह एक स्थिति है जहाँ बच्चे का विकास उसकी उम्र के हिसाब से थोड़ा धीमा हो जाता है — चाहे वो बोलना हो, समझना हो, चलना हो या दूसरों से जुड़ना हो।
अपने अनुभव से मैं आपको आसान भाषा में समझाना चाहता/चाहती हूँ कि आखिर इसके पीछे कारण क्या होते हैं।
सबसे पहले बात करते हैं जन्म से जुड़े कारणों की। कई बार डिले की शुरुआत वहीं से हो जाती है। अगर बच्चे को जन्म के समय ऑक्सीजन कम मिली हो, बच्चा समय से पहले पैदा हुआ हो, या उसका वजन बहुत कम रहा हो, तो इसका असर उसके दिमाग के विकास पर पड़ सकता है। ऐसे बच्चों में बाद में स्पीच डिले या समझने में दिक्कत देखी जा सकती है।
फिर आते हैं कुछ ऐसे कारण जो हमारे हाथ में नहीं होते — जैसे जेनेटिक कंडीशन्स। कुछ बच्चे जन्म से ही ऐसी स्थितियों के साथ आते हैं, जैसे ऑटिज़्म या डाउन सिंड्रोम। ऐसे बच्चों का विकास थोड़ा अलग तरीके से होता है। लेकिन यहाँ एक बहुत जरूरी बात समझिए — “अलग” का मतलब “असंभव” नहीं होता। सही थेरेपी और सपोर्ट से ये बच्चे भी बहुत कुछ सीख सकते हैं।
अब मैं एक बहुत कॉमन लेकिन अक्सर नजरअंदाज होने वाली बात कहूँगा/कहूँगी — सुनने की समस्या।
कई बार माता-पिता कहते हैं, “वो सुन तो लेता है, बस बोलता नहीं।” लेकिन असल में बच्चा हर आवाज़ को सही तरीके से नहीं सुन पा रहा होता। अगर सुनना साफ नहीं होगा, तो बोलना भी साफ नहीं होगा। इसलिए अगर जरा भी शक हो, तो hearing test जरूर कराना चाहिए।
आज के समय का एक बड़ा कारण है — हमारा बदलता हुआ लाइफस्टाइल।
सच बोलूँ तो, मोबाइल और टीवी ने बच्चों की दुनिया बदल दी है। पहले बच्चे घरवालों से बात करते थे, खेलते थे, चीज़ों को छूकर सीखते थे। अब कई बच्चे घंटों स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। इससे उनका interaction कम हो जाता है।
और बच्चा बात करके ही बोलना सीखता है, स्क्रीन देखकर नहीं।
कई घरों में मैंने यह भी देखा है कि बच्चा चुप रहता है, तो सब खुश हो जाते हैं — “शांत बच्चा है, परेशान नहीं करता।”
लेकिन कभी-कभी यही “शांत रहना” एक संकेत भी हो सकता है कि बच्चा engage नहीं कर पा रहा।
पोषण की बात भी बहुत जरूरी है।
अगर बच्चे को सही पोषण नहीं मिल रहा — जैसे आयरन, प्रोटीन या जरूरी विटामिन्स की कमी है — तो उसका असर सीधे उसके दिमाग और सीखने की क्षमता पर पड़ता है। कई बार बच्चा एक्टिव नहीं होता, ध्यान नहीं लगाता — और हमें लगता है कि वो “जिद्दी” है, जबकि असल में शरीर को जरूरी पोषण ही नहीं मिल रहा होता।
कुछ बच्चों में भावनात्मक कारण भी होते हैं।
अगर बच्चा खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता, या उसे पर्याप्त attention नहीं मिलता, तो वो अंदर ही अंदर सिमट सकता है। ऐसे बच्चे कम बोलते हैं, कम interact करते हैं, और धीरे-धीरे उनका development प्रभावित होने लगता है।
अब सबसे जरूरी बात — हमें क्या करना चाहिए?
मैं हमेशा एक बात कहता/कहती हूँ —
“अगर दिल में doubt आए, तो delay मत कीजिए।”
अगर आपका बच्चा:
- नाम पुकारने पर बार-बार जवाब नहीं देता
- 1.5–2 साल की उम्र तक meaningful शब्द नहीं बोल रहा
- आंखों में आंख डालकर बात नहीं करता
- simple instructions नहीं समझता
तो इसे “बाद में ठीक हो जाएगा” कहकर टालना सही नहीं है।
जितनी जल्दी आप कदम उठाएंगे, उतना ही बेहतर परिणाम मिलेगा।
The Trisense Speech Therapy and Child Development Centre, Rajajipuram, Lucknow में हम रोज़ ऐसे बच्चों के साथ काम करते हैं। शुरुआत में जो बच्चे बिल्कुल नहीं बोलते, वही धीरे-धीरे शब्द बोलना शुरू करते हैं, फिर छोटे वाक्य, और फिर confidence के साथ अपनी बात रखने लगते हैं।
यह कोई जादू नहीं है — यह सही दिशा, नियमित थेरेपी और माता-पिता के सहयोग का परिणाम होता है।
अगर आप अपने बच्चे को लेकर थोड़े भी चिंतित हैं, तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं या हमारी वेबसाइट पर जाकर और जानकारी ले सकते हैं:
The Trisense Speech Therapy and Child development Centre
अंत में बस इतना कहना चाहूँगा/चाहूँगी —
हर बच्चा खास होता है।
कुछ बच्चों को बस थोड़ा extra support चाहिए होता है।
और जब सही समय पर वो support मिल जाता है, तो वही बच्चा आपको गर्व महसूस कराता है।

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